(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.136. अध्यायः 136
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रत्य श्विन्यादिनक्षत्रेषु श्राद्धकरणस्य फलविशेषकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच।

यमस्तु यानि श्राद्धानि प्रोवाच शशबिन्दवे।
तानि मे शृणु काम्यानि नक्षत्रेषु पृथक्पृथक्॥ 13-136-1(86666)
श्राद्धं यः कृत्तिकायोगे कुर्वीत सततं नरः।
अग्नीनाधाय सापत्यो यजेत विगतज्वरः॥ 13-136-2(86667)
अपत्यकामो रोहिण्यां तेजस्कामो मृगोत्तमे।
क्रूरकर्मा ददच्छ्राद्धमार्द्रायां मानवो भवेत्॥ 13-136-3(86668)
कृषिभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वञ्श्राद्धं पुनर्वसौ।
पुष्टिकामोऽथ पुष्येण श्राद्धमीहेत मानवः॥ 13-136-4(86669)
आश्लेषायां ददच्छ्राद्धं धीरान्पुत्रान्प्रजायते।
ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठो मघासु श्राद्धमावपन्॥ 13-136-5(86670)
फल्गुनीषु ददच्छ्राद्धं सुभगः श्राद्धदो भवेत्।
अपत्यभागुत्तरासु हस्तेन फलभाग्भवेत्॥ 13-136-6(86671)
चित्रायां तु ददच्छ्राद्धं लभेद्रूपवतः सुतान्।
स्वातियोगे पितॄनर्च्य वाणिज्यमुपजीवति॥ 13-136-7(86672)
बहुपुत्रो विशाखासु पुत्रमीनहन्भवेन्नरः।
अनुराधासु कुर्वाणो राज्यचक्रं प्रवर्तयेत्॥ 13-136-8(86673)
आधिपत्यं व्रजेन्मर्त्यो ज्येष्ठायामपवर्जयन्।
नरः कुरुकुलश्रेष्ठ ऋद्धो दमपुरःसरः॥ 13-136-9(86674)
मूले त्वारोग्यमृच्छेत यशोऽषाढासु चोत्तमम्।
उत्तरासु त्वषाढासु वीतशोकश्चरेन्महीम्॥ 13-136-10(86675)
श्राद्धं त्वभिजितौ कुर्वन्विद्यां श्रेष्ठामवाप्नुयात्।
श्रवणेषु ददच्छ्राद्धं प्रेत्य गच्छेत्स तद्गतिम्॥ 13-136-11(86676)
राज्यभागी धनिष्ठायां भवेत नियतं नरः।
नक्षत्रे वारुणे कुर्वन्भिषक्सिद्धिमवाप्नुयात्॥ 13-136-12(86677)
पूर्वप्रोष्ठपदाः कुर्वन्बहून्विन्दत्यजाविकान्।
उत्तरासु प्रकुर्वाणो विन्दो गाः सहस्रशः॥ 13-136-13(86678)
बहुकुप्यकृतं वित्तं विन्दते रेवतीं श्रितः।
अश्विनीष्वश्वान्विन्देत भरणीष्वायुरुत्तमम्॥ 13-136-14(86679)
इमं श्राद्धविधिं श्रुत्वा शशबिन्दुस्तथाऽकरोत्।
अक्लेसेनाजयच्चापि महीं सोऽनुशशास ह॥ ॥ 13-136-15(86680)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 136 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-136-3 आर्द्रायां मानदो भवेदिति थ.पाठः॥ 7-136-6 फलभाक् इष्टार्थभाक्॥ 7-136-12 वारुणे शतभिषजि॥ 7-136-14 अश्वांश्चाश्वयुजेवेत्तीति ध.पाठः॥


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